पहली तख़्ती में कितने हुरूफ़ सिखाए जाते हैं?
29 अकेले हुरूफ़ (हुरूफ़-ए-मुफ़रदात)। हर हर्फ़ की अपनी अरबी आवाज़ है जो उसके अपने मख़रज से निकलती है, इसलिए सिर्फ़ शक्ल नहीं, आवाज़ भी पहचानें।
ا ب ت ث ج
नूरानी क़ायदे का हर तजवीद का क़ायदा, तख़्ती-ब-तख़्ती छोटे और आसान जवाबों में, क़ुरआन की मिसालों के साथ — बच्चों, बड़ों और दोहराई करने वाले उस्तादों के लिए।
29 अकेले हुरूफ़ (हुरूफ़-ए-मुफ़रदात)। हर हर्फ़ की अपनी अरबी आवाज़ है जो उसके अपने मख़रज से निकलती है, इसलिए सिर्फ़ शक्ल नहीं, आवाज़ भी पहचानें।
ا ب ت ث ج
मुस्तअलिया हुरूफ़: خ ص ض غ ط ق ظ। ये एक छोटे जुमले «خُصَّ ضَغْطٍ قِظْ» में जमा हैं — जुमला याद कर लें तो सातों याद हो जाएँगे।
خُصَّ ضَغۡطٍ قِظۡ
भरे मुँह से, मोटी आवाज़ (तफ़ख़ीम) के साथ, चाहे उन पर कोई भी हरकत हो। ज़बान का पिछला हिस्सा ऊपर उठता है; ज़ेर के साथ भी वे पुर ही रहते हैं, बस ज़बर से कुछ कम।
قَ قِ قُ
चार (शफ़वी हुरूफ़): ب ف م و। ب और م में दोनों होंठ मिलते हैं, و में होंठ गोल होते हैं मगर बंद नहीं होते, और ف में निचले होंठ का अंदरूनी हिस्सा ऊपर के सामने वाले दाँतों के किनारों से लगता है।
ب ف م و
तीन (सफ़ीरी हुरूफ़): ص س ز। ये ज़बान की नोक से सामने के दाँतों के क़रीब से निकलते हैं और इनमें हल्की सीटी सुनाई देती है — सीटी हल्की रखें, तेज़ नहीं।
ص س ز
सोलह हुरूफ़, सात गुटों में (क़रीबुस-सौत): ت ط · ث س ص · ذ ز ظ · د ض · ک ق · ح ہ · ء ع। इनमें से एक की जगह दूसरा पढ़ दिया जाए तो लफ़्ज़ का मतलब बदल सकता है, इसलिए हर गुट को साथ-साथ पढ़ें, यहाँ तक कि हर हर्फ़ अपने मख़रज से साफ़ निकले।
ت ط · ث س ص · ذ ز ظ · د ض
छह (हलक़ी हुरूफ़), तीन जोड़ों में: ء ہ हलक़ के सबसे गहरे हिस्से से, ع ح बीच से, غ خ मुँह के क़रीब वाले हिस्से से। आगे यही छह हुरूफ़ काम आएँगे: इनसे पहले नून साकिन साफ़ (इज़हार) पढ़ा जाता है।
ء ہ · ع ح · غ خ
हर हर्फ़ अपने नाम से, अलग-अलग पढ़ा जाता है। मद के निशान वाला तीन हर्फ़ी नाम (لٓام، مٓیم، صٓاد…) 6 गिनती खींचा जाता है; दो हर्फ़ी नाम (حا، یا، طا، ہا، را) सिर्फ़ 2 गिनती। کٓہٰیٰعٓصٓ और عٓسٓقٓ का عٓ 6 या 4 गिनती — 6 बेहतर है।
الٓمّٓ · کٓہٰیٰعٓصٓ
तीन छोटी हरकतें: ज़बर (फ़तहा) — हर्फ़ के ऊपर छोटी तिरछी लकीर, ज़ेर (कसरा) — यही लकीर हर्फ़ के नीचे, और पेश (ज़म्मा) — हर्फ़ के ऊपर छोटा و जैसा निशान।
بَ بِ بُ
छोटी और साफ़, अरबी लहजे में: सिर्फ़ एक गिनती के बराबर। न खींचें, न झटके से काटें, और ज़ेर को "ए" या पेश को "ओ" न बनाएँ।
بَ بِ بُ
तनवीन शब्द के आख़िर में दोहरा निशान है: दो ज़बर ـً, दो ज़ेर ـٍ या दो पेश ـٌ। यह ऐसा नून साकिन है जो लिखा नहीं जाता मगर पढ़ा जाता है, इसलिए "अन", "इन", "उन" पढ़ते हैं। इसी वजह से नून साकिन के सारे क़ायदे तनवीन पर भी लागू होते हैं।
بًا بٍ بٌ
खड़ा ज़बर ـٰ, खड़ी ज़ेर ـٖ और उल्टा पेश ـٗ। ये ज़बर, ज़ेर और पेश की छोटी, सीधी खड़ी शक्लें हैं।
بٰ بٖ بٗ
बिल्कुल मद के हर्फ़ की तरह: एक अलिफ़, यानी 2 गिनती। उँगलियों पर दो गिनें: هٰذَا, بِهٖ, لَهٗ।
ہٰذَا · بِہٖ · لَہٗ
तीन: ا و ی — अलिफ़, वाव और या, जब ये अपने से पहले वाली आवाज़ को लंबा करें।
قَالَ · قِیۡلَ · یَقُوۡلُ
पिछली हरकत देखें: ज़बर के बाद अलिफ़ (अलिफ़ पर कभी हरकत नहीं होती), पेश के बाद साकिन वाव, ज़ेर के बाद साकिन या। यानी ज़बर–अलिफ़, पेश–वाव, ज़ेर–या।
بَا · بُوۡ · بِیۡ
एक अलिफ़ = 2 गिनती (मद्दे तबई)। न कम, न ज़्यादा — जब तक इसके बाद हमज़ा या सुकून न हो।
یَقُوۡلُوۡنَ
अलिफ़ की अपनी कोई आवाज़ नहीं, इसलिए यह अपने से पहले वाले हर्फ़ के पीछे चलता है: पुर हर्फ़ के बाद पुर (قَالَ، طَابَ، رَاعِنَا) और बारीक हर्फ़ के बाद बारीक (کَانَ، بَابَ)।
قَالَ · کَانَ
दो: साकिन वाव या साकिन या, जिनसे पहले ज़बर हो (ज़बर के बाद وْ یْ)। "लीन" का मतलब है नर्म।
خَوۡفٍ · بَیۡتِ
मिलाकर पढ़ते वक़्त नर्मी और रवानी से: न खींचें, न झटका दें — बस नर्म-सी आवाज़, जैसे قُرَیْشٍ और خَوْفٍ में। (इन पर रुकने का हुक्म अलग है — तख़्ती 16 देखें।)
قُرَیۡشٍ · خَوۡفٍ
निशान ـْ का मतलब है कि हर्फ़ पर कोई हरकत नहीं। इसे पिछले हर्फ़ के साथ एक साँस में मिलाएँ: اَبْ = "अब", قُلْ = "क़ुल"।
اَبۡ · قُلۡ
हिलना या गूँजना। जब क़लक़ला का हर्फ़ साकिन हो तो उसका मख़रज हल्की-सी जुंबिश से छोड़ा जाता है और छोटी-सी गूँज सुनाई देती है — मगर उस पर कोई हरकत नहीं बढ़ाई जाती।
اَقۡ · اَطۡ
पाँच: ق ط ب ج د। इन्हें «قُطْبُ جَدٍّ» के जुमले से याद रखें।
قُطۡبُ جَدٍّ
जब भी हर्फ़ साकिन हो। लफ़्ज़ के बीच में हल्का (یَجْعَلُوْنَ), और लफ़्ज़ के आख़िर में उस पर रुकें तो सबसे ज़्यादा (اَحَدْ، الْفَلَقْ)।
اَحَدۡ · الۡفَلَقۡ
हलक़ में साफ़ और अचानक झटके से — आवाज़ हमज़ा पर एकदम रुकती है। इसे न गिराएँ और न लंबी आवाज़ बनाएँ।
مُؤۡصَدَۃٌ · اِقۡرَاۡ
चार, और फ़ैसला अगला हर्फ़ करता है: इज़हार (साफ़), इख़्फ़ा (छुपाना), इदग़ाम (मिलाना) और इक़लाब (मीम में बदलना)। इज़हार और इख़्फ़ा की मश्क़ इसी तख़्ती में है; इदग़ाम और इक़लाब तख़्ती 14 में।
اِظۡہَار · اِخۡفَاء · اِدۡغَام · اِقۡلَاب
इज़हार का मतलब है "ज़ाहिर करना"। जब नून साकिन या तनवीन के बाद छह हलक़ी हुरूफ़ (ء ہ ع ح غ خ) में से कोई आए तो नून को उसके अपने मख़रज से साफ़ पढ़ें, ग़ुन्ना के बिना: اَنْعَمْتَ، مَنْ اٰمَنَ، عَذَابٌ اَلِیْمٌ।
اَنۡعَمۡتَ · مَنۡ اٰمَنَ
इख़्फ़ा का मतलब है "छुपाना"। जब नून साकिन या तनवीन के बाद इख़्फ़ा के 15 हुरूफ़ में से कोई आए तो नून ज़बान से पूरा अदा नहीं किया जाता; वह ग़ुन्ना के साथ नाक में लगभग 2 गिनती छुपाया जाता है, और मुँह अगले हर्फ़ की तैयारी कर लेता है: اَنْزَلْنَا، مِنْ شَرِّ।
اَنۡزَلۡنَا · مِنۡ شَرِّ
ت ث ج د ذ ز س ش ص ض ط ظ ف ق ک। एक पुराना याददाश्त वाला शेर इन्हें अपने लफ़्ज़ों के पहले हुरूफ़ में जमा करता है: صِفْ ذَا ثَنَا کَمْ جَادَ شَخْصٌ قَدْ سَمَا ۞ دُمْ طَیِّبًا زِدْ فِیْ تُقًی ضَعْ ظَالِمَا। या आसान तरीक़ा: हर वह हर्फ़ जो न हलक़ी हो, न यरमलून, और न ب या ا।
صِفۡ ذَا ثَنَا کَمۡ جَادَ شَخۡصٌ قَدۡ سَمَا
तशदीद छोटा निशान ـّ है (छोटे "w" जैसा) जो हर्फ़ पर लिखा जाता है। ऐसे हर्फ़ को मुशद्दद यानी "दोहरा" कहते हैं।
رَبِّ · اِنَّ
एक में दो हर्फ़ समझकर: पहले साकिन होकर पिछले हरकत वाले हर्फ़ से मिलता है, फिर अपनी हरकत के साथ दोबारा पढ़ा जाता है — ज़ोर से, हल्का-सा ठहरकर। اَبَّ = اَبْ + بَ।
اَبَّ = اَبۡ + بَ
ग़ुन्ना वह गुनगुनाहट वाली आवाज़ है जो नाक से निकलती है। यह एक अलिफ़ — 2 गिनती — के बराबर होता है। आज़माकर देखें: نّ पढ़ते वक़्त नाक बंद करें तो आवाज़ रुक जाएगी।
اِنَّ · ثُمَّ
हमेशा 2 गिनती ग़ुन्ना के साथ — पढ़ते हुए भी और इन पर रुकते वक़्त भी।
اِنَّ · ثُمَّ · اَمَّا
ज़ोर देकर, पूरे वज़न के साथ। अगर लफ़्ज़ के आख़िर में ऐसे हर्फ़ पर रुकें (الْحَقّْ) तो तशदीद बाक़ी रखें और क़लक़ला सबसे ज़्यादा करें।
تَبَّتۡ · الۡحَقّۡ
तफ़ख़ीम: हर्फ़ को मोटा, मुँह भरकर पढ़ना (जैसे قَ)। तरक़ीक़: हर्फ़ को बारीक, हल्का पढ़ना (जैसे کَ)। सात पुर हुरूफ़ हमेशा तफ़ख़ीम से; ر, अल्लाह के नाम का लाम और अलिफ़ दोनों तरह आते हैं।
قَ / کَ
उससे बिल्कुल पहले वाले हर्फ़ को देखें। ज़बर या पेश → पुर (قَالَ اللّٰهُ، رُسُلُ اللّٰهِ; और जब اَللّٰهُ से शुरू करें)। ज़ेर → बारीक (بِسْمِ اللّٰهِ، لِلّٰهِ)।
قَالَ اللّٰہُ · بِسۡمِ اللّٰہِ
अगले हर्फ़ की वजह से। 14 "शम्सी हुरूफ़" (ت ث د ذ ر ز س ش ص ض ط ظ ل ن) से पहले लाम उनमें मिल जाता है और उन पर तशदीद आ जाती है। बाक़ी 14 "क़मरी हुरूफ़" से पहले लाम जज़्म के साथ साफ़ पढ़ा जाता है।
اَلشَّمۡسُ · اَلۡقَمَرُ
इदग़ाम का मतलब है "मिला देना"। जब अगला लफ़्ज़ यरमलून के किसी हर्फ़ से शुरू हो तो नून उसमें गुम हो जाता है और वह हर्फ़ तशदीद के साथ दोहरा पढ़ा जाता है: مِنْ رَّبِّهِمْ، مَنْ یَّقُوْلُ।
مِنۡ رَّبِّہِمۡ · مَنۡ یَّقُوۡلُ
छह: ی ر م ل و ن, लफ़्ज़ «یَرْمَلُوْنَ» से। इनमें से चार — ی ن م و (یَنْمُوْ) — में इदग़ाम ग़ुन्ना के साथ होता है; ل और ر में बिल्कुल ग़ुन्ना नहीं।
یَرۡمَلُوۡنَ
हाँ — जब दोनों एक ही लफ़्ज़ में हों। तब नून साफ़ पढ़ा जाता है (इज़हार-ए-मुतलक़), ग़ुन्ना के बिना। क़ुरआन में ऐसा सिर्फ़ चार लफ़्ज़ों में है: دُنْیَا، بُنْیَانٌ، قِنْوَانٌ، صِنْوَانٌ।
دُنۡیَا · قِنۡوَانٌ
इक़लाब का मतलब है "बदल देना"। जब नून साकिन या तनवीन के बाद ب आए तो नून मीम से बदल जाता है और उस मीम को ग़ुन्ना के साथ, होंठ हल्के-से बंद करके, छुपाया जाता है। क़ुरआन में इसका निशान छोटी मीम ۢ है: مِنْۢ بَعْدِ।
مِنۡۢ بَعۡدِ · سَمِیۡعٌۢ بَصِیۡرٌ
इदग़ाम शफ़वी, इख़्फ़ा शफ़वी और इज़हार शफ़वी। "शफ़वी" का मतलब है "होंठों वाला", क्योंकि मीम होंठों का हर्फ़ है। कौन-सा क़ायदा लगेगा, यह मीम के बाद वाला हर्फ़ बताता है।
لَہُمۡ مَّا · تَرۡمِیۡہِمۡ بِحِجَارَۃٍ · عَلَیۡہِمۡ غَیۡرِ
जब मीम साकिन के बाद दूसरी मीम आए: दोनों मीमें मिलकर एक मुशद्दद मीम बन जाती हैं जो 2 गिनती ग़ुन्ना से पढ़ी जाती है — لَهُمْ مَّا، کَمْ مِّنْ।
لَہُمۡ مَّا · کَمۡ مِّنۡ
जब मीम साकिन के बाद ب आए: मीम को ग़ुन्ना के साथ छुपाया जाता है, होंठ हल्के-से मिलते हैं, फिर ب पढ़ी जाती है — تَرْمِیْهِمْ بِحِجَارَةٍ।
تَرۡمِیۡہِمۡ بِحِجَارَۃٍ
م और ب के सिवा हर हर्फ़ से पहले: मीम साफ़ पढ़ी जाती है, ग़ुन्ना के बिना — عَلَیْهِمْ غَیْرِ। و और ف से पहले ख़ास एहतियात करें, क्योंकि वहाँ होंठ मीम को छुपाने की तरफ़ जाते हैं: هُمْ فِیْهَا।
عَلَیۡہِمۡ غَیۡرِ · ہُمۡ فِیۡہَا
मद का मतलब है "खींचना"। मद का हर्फ़ फ़ितरी तौर पर 2 गिनती का है; यह सिर्फ़ किसी सबब से लंबा होता है, और सबब सिर्फ़ दो हैं: इसके बाद हमज़ा (ء) या सुकून का आना।
جَآءَ · الضَّآلِّیۡنَ
छह। हमज़ा की वजह से: मद्दे मुत्तसिल और मद्दे मुनफ़सिल। मुस्तक़िल सुकून की वजह से: मद्दे लाज़िम और मद्दे लीन लाज़िम। सिर्फ़ रुकने पर आने वाले सुकून की वजह से: मद्दे आरिज़ और मद्दे लीन आरिज़।
مُتَّصِل · مُنۡفَصِل · لَازِم · عَارِض
"मिला हुआ" मद: मद का हर्फ़ और हमज़ा एक ही लफ़्ज़ में हों — جَآءَ، السَّمَآءِ। इसे 4 या 5 गिनती (2 या ढाई अलिफ़) खींचें, और हर जगह एक जैसी लंबाई रखें।
جَآءَ · السَّمَآءِ
"अलग-अलग" मद: मद का हर्फ़ एक लफ़्ज़ के आख़िर में और हमज़ा अगले लफ़्ज़ के शुरू में — بِمَآ اُنْزِلَ، یٰٓاَیُّهَا। इसे भी 4 या 5 गिनती खींचा जाता है।
بِمَآ اُنۡزِلَ · یٰٓاَیُّہَا
मद के हर्फ़ के बाद ऐसा सुकून जो कभी नहीं हटता — उसी लफ़्ज़ में जज़्म या तशदीद: الضَّآلِّیْنَ، دَآبَّةٍ، آٰلْئٰنَ। यह सबसे लंबा मद है: हमेशा पूरी 6 गिनती (3 अलिफ़)।
الضَّآلِّیۡنَ · آٰلۡئٰنَ
लीन के हर्फ़ के बाद मुस्तक़िल सुकून। यह सिर्फ़ हर्फ़ عٓ (ऐन) के नाम में आता है: کٓهٰیٰعٓصٓ (मरयम 1) और حٰمٓ ۚ عٓسٓقٓ (अश-शूरा 1–2)। इसे 6 गिनती खींचें; 4 भी जाइज़ है, मगर 6 बेहतर है।
کٓہٰیٰعٓصٓ · حٰمٓ عٓسٓقٓ
जब किसी लफ़्ज़ पर रुकें तो उसका आख़िरी हर्फ़ साकिन हो जाता है। अगर उस हर्फ़ से बिल्कुल पहले मद का हर्फ़ हो तो मद 2, 4 या 6 गिनती पढ़ सकते हैं: الْعٰلَمِیْنْ، نَسْتَعِیْنْ। एक लंबाई चुनकर पूरी तिलावत में वही रखें।
الۡعٰلَمِیۡنۡ · نَسۡتَعِیۡنۡ
यही बात लीन के हर्फ़ के साथ: जब किसी लफ़्ज़ पर रुकें और आख़िरी हर्फ़ से बिल्कुल पहले लीन का हर्फ़ हो तो उसे 2, 4 या 6 गिनती पढ़ सकते हैं — خَوْفْ، الْبَیْتْ। मिलाकर पढ़ें तो लीन छोटा और नर्म ही रहता है।
خَوۡفۡ · الۡبَیۡتۡ
(1) जब उस पर ज़बर, पेश, दो ज़बर, दो पेश या खड़ा ज़बर हो — رَبُّ، رُسُلٌ، ذِکْرٰی।
(2) जब साकिन हो और पहले हर्फ़ पर ज़बर या पेश हो — مَرْیَمَ، قُرْاٰنٌ।
(3) जब आरिज़ी (अस्थायी) ज़ेर के बाद साकिन हो — اِرْجِعِیْ।
(4) जब ऐसी ज़ेर के बाद साकिन हो जो पिछले लफ़्ज़ की हो — رَبِّ ارْجِعُوْنِ।
(5) जब ज़ेर के बाद साकिन हो मगर उसी लफ़्ज़ में उसके बाद पुर हर्फ़ हो — مِرْصَادًا، قِرْطَاسٍ।
رَبُّ · مَرۡیَمَ · ذِکۡرٰی · اِرۡجِعِیۡ · مِرۡصَادًا
(1) जब उस पर ज़ेर या दो ज़ेर हों — رِجَالٌ।
(2) जब उसी लफ़्ज़ की असली ज़ेर के बाद साकिन हो और उसके बाद पुर हर्फ़ न हो — فِرْعَوْنَ।
(3) जब उस पर रुकें और उससे पहले साकिन ی हो — خَیْرْ، قَدِیْرْ।
رِجَالٌ · فِرۡعَوۡنَ · خَیۡرۡ
क़ुरआन के कुछ लफ़्ज़ ऐसे अलिफ़ से शुरू होते हैं जिस पर अपनी कोई हरकत नहीं होती (हमज़तुल-वस्ल)। ऐसे लफ़्ज़ से पढ़ना शुरू करें तो सिर्फ़ शुरुआत के लिए उस अलिफ़ पर ज़ेर लगाकर पढ़ते हैं — اِرْجِعِیْ। यह ज़ेर उधार की है, लफ़्ज़ का हिस्सा नहीं, इसलिए इसके बाद साकिन ر पुर ही रहती है।
اِرۡجِعِیۡ · اِرۡتَابُوۡا
वक़्फ़ का मतलब है रुकना: लफ़्ज़ के आख़िर में आवाज़ ख़त्म करना — और आम तौर पर साँस लेना — फिर आगे पढ़ना। जिस लफ़्ज़ पर रुकें, उसके आख़िरी हर्फ़ का ज़बर, ज़ेर, पेश, दो ज़ेर या दो पेश हट जाता है और हर्फ़ साकिन हो जाता है: نَسْتَعِیْنُ ← نَسْتَعِیْنْ।
نَسۡتَعِیۡنُ ← نَسۡتَعِیۡنۡ
दो ज़बर अलिफ़ में बदल जाते हैं: एक ज़बर और 2 गिनती का अलिफ़ पढ़ें — عَلِیْمًا "عَلِیْمَا" और ہُدًی "ہُدٰی" बन जाता है।
عَلِیۡمًا ← عَلِیۡمَا
उस पर कोई भी हरकत या तनवीन हो, रुकने पर यह साकिन ہ पढ़ी जाती है: رَحْمَةٌ ← رَحْمَہْ, الْجَنَّةِ ← الْجَنَّہْ।
رَحۡمَۃٌ ← رَحۡمَہۡ
आयत मुकम्मल हो गई (वक़्फ़-ए-ताम)। यह रुकने और साँस लेने की फ़ितरी जगह है। अगर गोल निशान के ऊपर لا लिखा हो तो वहाँ रुकने में उलमा का इख़्तिलाफ़ है; रुकना और मिलाना दोनों दुरुस्त हैं।
○
م (वक़्फ़-ए-लाज़िम): ज़रूर रुकें — मिलाने से मतलब बदल सकता है। ط (वक़्फ़-ए-मुतलक़): यहाँ रुकें। ج (वक़्फ़-ए-जाइज़): रुकना बेहतर, मिलाना जाइज़। ز (मुजव्वज़): रुक सकते हैं मगर मिलाना बेहतर। ص (मुरख़्ख़स): हो सके तो मिलाकर पढ़ें; सिर्फ़ ज़रूरत हो तो रुकें, जैसे साँस लेने के लिए।
م · ط · ج · ز · ص
जब لا लाइन में अकेला हो तो वहाँ न रुकें — रुकने से मतलब टूट सकता है। अगर साँस टूट जाए और रुकना पड़े तो एक-दो लफ़्ज़ पीछे से मिलाकर दोबारा पढ़ें (इआदा)। जब لا आयत के गोल निशान के ऊपर हो तो आयत के आख़िर वाला क़ायदा देखें।
لا
रुकने के बाद पीछे लौटना: जहाँ रुके थे उससे पहले के एक-दो लफ़्ज़ दोहराकर उन्हें अगले हिस्से से मिलाकर पढ़ना, ताकि मतलब मुकम्मल पढ़ा जाए।
اِعَادَہ
बहुत छोटा ठहराव: साँस लिए बिना एक लम्हे के लिए आवाज़ रुकती है, फिर आगे पढ़ते हैं। रिवायत-ए-हफ़्स में चार जगह ज़रूरी है: عِوَجًا (अल-कहफ़ 1), مَّرْقَدِنَا (या-सीन 52), مَنْ رَاقٍ (अल-क़ियामा 27) और بَلْ رَانَ (अल-मुतफ़्फ़िफ़ीन 14)।
مَنۡ ۜ رَاقٍ
जब तनवीन के बाद हमज़तुल-वस्ल आए तो मिलाकर पढ़ने में हमज़ा गिर जाता है और दो साकिन आवाज़ें मिल जाती हैं। इसलिए तनवीन का छुपा हुआ नून ज़ेर लेकर दोनों को मिलाता है; क़ुरआन में यह छोटे नून से दिखाया जाता है: لُّمَزَةِ ۨالَّذِیْ को "लुमज़तिनिल्लज़ी" पढ़ते हैं।
لُّمَزَۃِ ۨالَّذِیۡ
"आसान करना": जब दो हमज़े मिलें तो दूसरा नर्मी से, हमज़ा और अलिफ़ के दरमियान पढ़ा जाता है। रिवायत-ए-हफ़्स में ऐसा सिर्फ़ एक लफ़्ज़ में है: ءَاَعْجَمِیٌّ (फ़ुस्सिलत 44)।
ءَاَعۡجَمِیٌّ
"झुकाना": ज़बर को ज़ेर की तरफ़ और अलिफ़ को ی की तरफ़ झुकाकर पढ़ना, जिससे उर्दू "ए" (ے) जैसी आवाज़ बनती है। रिवायत-ए-हफ़्स में यह एक जगह है: مَجْرٖىهَا (हूद 41), जहाँ ر को "रे" पढ़ा जाता है — "मजरेहा" — और बारीक पढ़ा जाता है।
مَجۡرٖیہَا
ऐसा अलिफ़ जो क़ुरआन में लिखा हुआ है मगर कभी पढ़ा नहीं जाता। उस पर अपना कोई निशान नहीं होता (कुछ नुस्ख़ों में उस पर छोटा गोल दायरा होता है)। आम जगहें: जमा के सीग़े के वाव के बाद — قَالُوْا — और مِائَةٌ में। लफ़्ज़ ऐसे पढ़ें जैसे वह अलिफ़ मौजूद ही नहीं।
قَالُوۡا · مِائَۃٌ
क़ायदे सुनकर और दोहराकर सीखे जाते हैं। मुफ़्त वन-टू-वन ट्रायल क्लास बुक करें — मर्द और ख़वातीन उस्ताद मौजूद हैं।